इंसानियत का सच्चा रूप.
काश मुझे कोई समझ सकता इस संसार की व्यवस्था ना कोई किसी का भाई ना किसी का परिवार इंसान को सिर्फ पैसा से है प्यार मैं इंसान समझ कर खुद को बहुत कोसता हूं क्योंकि अपनी खुशी पाने के लिए कईयों को मार देता हूं देखता देखता हूं अपने चारों तरफ पैसा की है बात पैसा है तो ठीक वरना सब ख़ाक है हर वक्त सोचता हूं परेशान होता हूं मेरी जिंदगी तो ठीक है दो वक्त की रोटी तो है दो वक्त की रोटी तो है पर सोच कर उनके जिनके पास ना खाने को ना रहने को एक साथ है क्या उसकी पत्नी छोटे बच्चे 243 बिना खाए सो लेते हैं कुछ नहीं तो पानी पीकर हफ्ते बिता देते हैं उनको देखता हूं तो उन पर तरस आता है आंखों से आंसू भर आता है लेकिन उनके झुलसे पान को देखकर दिल भी झुलस जाता है हर दिन हम दो चार रोटी या चावल सड़क पर फेंक देते हैं उन्हीं को फेंककर वह बहुत खुश होते हैं
और कहते हैं जाते हैं भगवान उसे खुश रखना जिनसे या भोजन हमें मिला उसी को अच्छा दिन समझकर दिवाली मना लेते हैं उनको खाना खाते देख मुझे उन पर तरस आ गया उनको चावल से खाते देख मुझे भी लालच आ गया हर हर पहले सुबह हमारे साथ मैं चाय ब्रेड होता है थोड़ी देर हो जाए तो नौकर को ना कह दिया जाता है वही पहले सुबह में वह सामने लेकर घूमते हैं कहीं से चंद पैसा पाने की आशा में इधर-उधर भटकते रहते हैं जिस उम्र में उनके नाजुक और कोमल हाथों में किताब खिलौना होना चाहिए उन हाथों से काम करके उनके हाथों में छाले निकल आते हैं पड़ता देख मेरा दिल जुलस गया फिर भी आंखों से आंसू गिर गया दौरा और उनको अपने गले से लगा लिया
और कहते हैं जाते हैं भगवान उसे खुश रखना जिनसे या भोजन हमें मिला उसी को अच्छा दिन समझकर दिवाली मना लेते हैं उनको खाना खाते देख मुझे उन पर तरस आ गया उनको चावल से खाते देख मुझे भी लालच आ गया हर हर पहले सुबह हमारे साथ मैं चाय ब्रेड होता है थोड़ी देर हो जाए तो नौकर को ना कह दिया जाता है वही पहले सुबह में वह सामने लेकर घूमते हैं कहीं से चंद पैसा पाने की आशा में इधर-उधर भटकते रहते हैं जिस उम्र में उनके नाजुक और कोमल हाथों में किताब खिलौना होना चाहिए उन हाथों से काम करके उनके हाथों में छाले निकल आते हैं पड़ता देख मेरा दिल जुलस गया फिर भी आंखों से आंसू गिर गया दौरा और उनको अपने गले से लगा लिया

No comments:
Post a Comment